आह्वान

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  • 12:34:33 अपराह्न on अक्टूबर 28, 2008 | 0 | # |

    जगा दो जगा दो नौजवां को जगा दो

    मिटा दो मिटा दो नाम-ऐ-ज़ुल्मत मिटा दो.

      ज़माने में नफरत का व्यापार क्यों है?

      गुनाहों का इंसान पे अधिकार क्यों है?

      चमन आदमीयत की बीमार क्यों है?

      ये लाशों पे लाशों का अम्बार क्यों है?

      कहाँ हो वीर जागो,

      उठो सम्हालो भारत की तकदीर जागो.

      चिराग-ऐ-वतन खूने-दिल से जला दो,

      नाम-ऐ-ज़ुल्मत मिटा दो.

    अगर हिंद में यूँ ही कोहराम होगा,

    शहीदों का गुलशन बदनाम होगा,

    जवानो भारत की जवानी बचाओ,

    शहीदों की अन्तिम निशानी बचाओ,

    ये चंगेज़-हिटलर की सरकार तोड़ो,

    जो ढाए सितम आसमां को गिरा दो,

    नाम-ऐ-ज़ुल्मत मिटा दो.

      जिधर देखिये सिसकियों का फ़साना,

      कोई जीते जी मौत का निशाना,

      ये किस माँ की ममता का घर जल गया,

      बसाया किसी का नगर जल गया,

      सुहागिन अभागिन सजन के बिना,

      कोई लाश रोये कफ़न के बिना.

      परेशानियों का ज़माना उठा दो,

      नाम-ऐ-ज़ुल्मत मिटा दो.

    वो पागल हवाएं पुकारे हैं तुमको.

    वे चारों दिशाएँ निहारे हैं तुमको.

    ये खामोश दरिया को दे दो रवानी,

    उठो नस्ल-ऐ-आदम में लिख दो कहानी.

    कि मंज़िल से भी आगे जाना है तुमको,

    नया एक ज़माना बनाना है तुमको.

    हकीकत से ख़्वाबों कि दुनिया सजा दो,

    नाम-ऐ-जुल्मत मिटा दो.

                                            राज इन्कलाब

    साभार परिकपना प्रकाशन